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Saturday, January 9, 2010

Zindagi

ज़िन्दगी एक पहेली है , बूझूं मै कैसे ?
नहीं होती वैसी , दिखाई देती हो जैसे

यकीं हो जिस बात पर पूरा , वही काम रह जाए अधूरा
सपनो की लहरों को, न किनारा मिला हो जैसे

सपनो की दुनिया ये कितनी निराली
ले जाये वहां जहाँ नज़रे भी न डालीं

अचानक अँधेरा गहराया हो जैसे
तूफां का आलम छाया हो जैसे
कहीं बिखरे हैं कुछ ख्वाबों के टुकड़े
चुभते तीर-से , बीती दुनिया के दुखड़े 

समझ सका न समझा सका कोई
चांदनी क्यों चाँद की मौजूदगी में रोई

पतझड़ के बाद है बहार आती

गुमसुम कलियाँ फिर खिलखिलातीं
नज़ारे देख आँखे जगमगातीं
ख्वाबों की दुनिया में फिर डूब जातीं
नजरिया मेरा शायद बदल गया हो ऐसे

क्यूंकि होती नहीं दिखाई देती है जैसे
ज़िन्दगी एक पहेली है .
" भला बूझूं  मैं  कैसे ?"

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