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Saturday, January 9, 2010

नेता बनाम .."पैचान कौन ??"

देशप्रेम का पाठ सही , मैं पढ़ा नहीं सकता
मजलूमों के दुःख-दर्द को बाट नहीं सकता
देश की तरक्की के लिए सोच नही सकता
दहेज़ प्रथा खुदके घर में तक रोक नहीं सकता

पैचान कौन? कौन हूँ मैं?
क्या कहा , गद्दार हूँ?
क्या कहा , देशद्रोही हूँ?

सभामंचों पर देशप्रेम के गीत  गता हूँ
पर समाज में धर्म की दीवार बनता हूँ
विपदा में लोगों को देख , मैं मुंह फेरता हूँ
 विदेशी माल की दिन-रात मैं माला जपता हूँ

पैचान कौन? कौन हूँ मैं?
क्या कहा गद्दार हूँ?
क्या कहा. देशद्रोही हूँ?

.....
देशप्रेम है मेरे लिए बस "सेमिनार" का एक "सैशन "
या है वो फैन्सी-ड्रेस  का कोई  "आईटम !"
जवानों के हाल की मुझे न कोई "टेंशन "
मुझे तो बस चैनलों  पर चाहिए 
हर हाल में "अटैंशन" !

ठीक पहचाना -
हाँ मैं देशद्रोही हूँ
हाँ मैं गद्दार हूँ
नेता के लिबास में
अब रावण का अवतार हूँ .. !


Zindagi

ज़िन्दगी एक पहेली है , बूझूं मै कैसे ?
नहीं होती वैसी , दिखाई देती हो जैसे

यकीं हो जिस बात पर पूरा , वही काम रह जाए अधूरा
सपनो की लहरों को, न किनारा मिला हो जैसे

सपनो की दुनिया ये कितनी निराली
ले जाये वहां जहाँ नज़रे भी न डालीं

अचानक अँधेरा गहराया हो जैसे
तूफां का आलम छाया हो जैसे
कहीं बिखरे हैं कुछ ख्वाबों के टुकड़े
चुभते तीर-से , बीती दुनिया के दुखड़े 

समझ सका न समझा सका कोई
चांदनी क्यों चाँद की मौजूदगी में रोई

पतझड़ के बाद है बहार आती

गुमसुम कलियाँ फिर खिलखिलातीं
नज़ारे देख आँखे जगमगातीं
ख्वाबों की दुनिया में फिर डूब जातीं
नजरिया मेरा शायद बदल गया हो ऐसे

क्यूंकि होती नहीं दिखाई देती है जैसे
ज़िन्दगी एक पहेली है .
" भला बूझूं  मैं  कैसे ?"